नई दिल्ली. सिनेमा की भाषा में ‘रोड ट्रिप’ सिर्फ एक सफर नहीं, बल्कि खुद से मुलाकात का जरिया होती है. जब कोई बंदा या बंदी गाड़ी की चाबी घुमाकर हाईवे पर निकलता है वतो वो सिर्फ किलोमीटर पार नहीं करता, बल्कि अपने भीतर दबे किसी दर्द या अधूरी ख्वाहिश के पीछे भाग रहा होता है. राइटर और निर्देशक कार्तिक चौधरी की फिल्म ‘हीर सारा’ भी इसी वादे के साथ थिएटर का पर्दा उठाती है. दो बिल्कुल अलग मिजाज की लड़कियां (पत्रलेखा-मानवी गागरू) हैं, एक भारी-भरकम बुलेट मोटरसाइकिल है और इंदौर से लेकर पोंडिचेरी तक की खुली सड़कें हैं. सफर में एंटरटेनमेंट का हर गियर मौजूद है, लेकिन अफसोस कि फिल्म मंजिल पर पहुंचने से पहले ही न्यूट्रल हो जाती है.
विजुअल्स में दम, राइटिंग कम
कार्तिक चौधरी ने फिल्म का जो ताना-बाना बुना है, वो नया नहीं है. शुरुआत थोड़ी सुस्त है, जहां किरदारों के ‘इमोशनल बैगेज’ को समझाने में जरूरत से ज्यादा वक्त लिया गया है. लेकिन जैसे ही बुलेट हाईवे पर सरपट दौड़ना शुरू करती है, फिल्म की रफ्तार भी गियर बदलती है. फिल्म सिर्फ टाइमपास नहीं करती, बल्कि यह उन नजरों पर भी चोट करती है, जो हाईवे पर एक अकेली लड़की को भारी-भरकम बाइक चलाते देख अजीब से कयास लगाने लगती हैं. समाज का लड़कियों को ‘सलीके’ से रहने और वक्त पर शादी करने का जो पुराना प्रेशर कुकर है, उसकी सीटी भी फिल्म में रुक-रुक कर बजती है. लेकिन दिक्कत यह है कि डायरेक्टर इन गंभीर मुद्दों को सिर्फ छूकर निकल जाते हैं, उनकी गहराई में उतरने का रिस्क नहीं लेते. रोड ट्रिप फिल्मों की जान होती है उसकी अनप्रेडिक्टेबिलिटी. मगर यहां कहानी इतनी सीधी चलती है कि आप पॉपकॉर्न चबाते हुए आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि अगले टोल नाके पर क्या होने वाला है. जब सब कुछ पहले से तयशुदा लगने लगे, तो सफर का रोमांच आधा हो जाता है.
पत्रलेखा का ठहराव, मानवी का स्पार्क
फिल्म को अगर किसी चीज ने गिरने से बचाया है तो वो है इसकी दोनों लीड एक्ट्रेसेस की जुगलबंदी. पत्रलेखा ने सारा के किरदार में एक कमाल का ठहराव और दर्द दिखाया है. उनकी आंखों में मां को खोजने की बेताबी साफ दिखती है. एक ऐसी लड़की जो खुद की ‘सोलो राइडिंग कंपनी’ खोलना चाहती है, उस किरदार की जिद को पत्रलेखा ने बिना किसी लाउडनेस के पेश किया है. वहीं, मानवी गागरू इस सफर में ‘एनर्जी ड्रिंक’ जैसा काम किया है. जब-जब फिल्म अपनी धीमी रफ्तार से बोर करने लगती है, मानवी अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग और बेबाक डायलॉग्स से स्क्रीन पर जान फूंक देती हैं. उनका यह बिंदास अंदाज कई जगह इम्तियाज अली की ‘जब वी मेट’ की ‘गीत’ की वाइब्स देता है. बाकी के साइड किरदारों के पास करने को कुछ खास नहीं था, इसलिए वो बस फ्रेम भरने के काम आए हैं.
फिल्म को कार्तिक चौधरी ने डायरेक्ट किया है.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी दो ऐसी लड़कियों के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो अपनी-अपनी जिंदगी के उलझे हुए सिरों को सुलझाने के लिए एक अनजाने सफर पर निकलती हैं. सारा (पत्रलेखा) इंदौर में अपने पिता (आरिफ जकारिया) के साथ रहती है. दोनों के बीच एक अजीब सी खामोशी और दूरी है. सारा के दिल में बचपन का एक ऐसा जख्म है जो आज तक हरा है. जब वह सिर्फ दस साल की थी, तब उसकी मां (श्वेता साल्वे) उसे छोड़कर चली गई थी. सारा को अपनी मां की यादों का सहारा सिर्फ उस पुरानी मोटरसाइकिल में मिलता है, जो कभी उसकी मां चलाया करती थी. एक दिन सारा को कुछ ऐसे सुराग मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि उसकी मां पोंडिचेरी में हो सकती है. वह बिना ज्यादा सोचे अपनी मां की बाइक उठाती है और इंदौर से पोंडिचेरी के लंबे सफर पर निकल पड़ती है.
इस सफर की शुरुआत में ही सारा की मुलाकात हीर (मानवी गागरू) से होती है. हीर एक अमीर, बिंदास और थोड़े चुलबुले स्वभाव की लड़की है, जो बड़े शहर की रईसियत का मिजाज रखती है. हीर के पोंडिचेरी जाने की वजह बिल्कुल अलग है. उसे वहां जाकर अपने बॉयफ्रेंड तन्मय (निशांक वर्मा) की शादी को रोकना है. दो बिल्कुल विपरीत स्वभाव की अजनबी लड़कियां एक ही मोटरसाइकिल पर सवार होती हैं और यहां से शुरू होता है ‘हीर-सारा’ का सफर, जो उन्हें न सिर्फ पोंडिचेरी की तरफ ले जाता है, बल्कि दोस्ती, हीलिंग और खुद को पहचानने के एक नए रास्ते पर भी खड़ा कर देता है.
सफर ठीकठाक है, बस मंजिल थोड़ी फीकी रह गई
कुल मिलाकर ‘हीर सारा’ एक ऐसी संडे-वॉच फिल्म है जिसे आप चाय की चुस्कियों के साथ देख सकते हैं. यह दो लड़कियों की दोस्ती, उनके बीच के अपनेपन और खूबसूरत रास्तों की एक प्यारी सी रील है. पत्रलेखा और मानवी की एक्टिंग आपका दिल जीतेगी, लेकिन अगर आप इस सफर से किसी बहुत बड़े लाइफ-चेंजिंग एक्सपीरियंस या गहरे इमोशन की उम्मीद कर रहे हैं तो शायद पोंडिचेरी पहुंचते-पहुंचते आपको थोड़ा खालीपन महसूस हो. कुल मिलाकर सफर ठीकठाक है, बस मंजिल थोड़ी फीकी रह गई.
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