नई दिल्ली. एक पिता का मां के प्यार के लिए खामोश समर्पण और अपने बच्चे के लिए अपनी इच्छाओं का खामोश त्याग अक्सर सिल्वर स्क्रीन पर अनसुना रह जाता है. फिल्म ‘समर्पित: फादर्स लव’ इसी बहुत ही सेंसिटिव पहलू को सिल्वर स्क्रीन पर जीवंत करती है. आज के शोर, वीएफएक्स और एक्शन की दुनिया में यह फिल्म ताजी हवा के झोंके जैसी है. यह सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि हर पिता के अनकहे संघर्ष को समर्पित एक दिल को छू लेने वाला सिनेमाई तोहफा है.
कहानी
‘समर्पित: फादर्स लव’ की कहानी एक आदमी के पिता बनने के सफर और उसके बाद अपने बच्चे का भविष्य सुरक्षित करने के लिए किए गए त्याग के इर्द-गिर्द घूमती है. मुख्य किरदार अपने बच्चे की खुशी के लिए खुशी-खुशी अपने सपनों, इच्छाओं और यहां तक कि निजी खुशी का भी त्याग कर देता है. फिल्म का मुख्य फोकस उसकी चुप्पी और हिचकिचाहट के पीछे छिपी सिसकियां और अकेलापन है. कहानी किसी एक समय तक सीमित नहीं है. यह कई दशकों के समय को दिखाती है. गांव के बैकग्राउंड से लेकर शहर की चकाचौंध तक, यह सफर एक आम पिता की जिंदगी की असलियत दिखाता है. स्क्रिप्ट राइटर एक्शान खान ने अंकित यादव के साथ मिलकर एक जमीनी और समझदारी भरा स्क्रीनप्ले तैयार किया है, जिसके डायलॉग सीधे दर्शकों से जुड़ते हैं. यह फिल्म रोजमर्रा की जिंदगी की कड़वाहट और पारिवारिक रिश्तों के नाजुक धागों को खूबसूरती से बुनती है.
एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें तो, निशा अली और अंकित यादव की को-राइटिंग वाली इस मुश्किल कहानी में, अंकित ने एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी उठाई. उन्हें स्क्रीन पर सिर्फ एक या दो नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग उम्र और समय को दिखाना था. एक एनर्जेटिक और जिंदादिल 24 साल के लड़के से एक सीरियस और जिम्मेदार 45 साल के घर के मालिक और आखिर में एक बेबस और कांपते हुए 60 साल के बुजुर्ग में उनका फिजिकल और मेंटल ट्रांसफॉर्मेशन हैरान करने वाला है. यह परफॉर्मेंस उनके स्किल और अपने काम के प्रति पक्के डेडिकेशन का सबूत है. अंकित यादव की परफॉर्मेंस को उनके उतने ही बेहतरीन और सधे हुए को-स्टार्स ने भी पूरा किया है. जानी-मानी एक्ट्रेस जया भट्टाचार्य अपने खास इमोशनल स्टाइल और बारीक डिलीवरी से स्क्रीन पर एक जबरदस्त गहराई पैदा करती हैं. जब भी वह स्क्रीन पर आती हैं, सीन की इमोशनल इंटेंसिटी बढ़ जाती है. उनके साथ जावेद हैदर, कोमल हरपिलानी, प्रक्षिका शर्मा, देव व्यास और मीत वर्मा जैसे अनुभवी एक्टर अपनी गंभीर और ईमानदार परफॉर्मेंस से फिल्म के सबप्लॉट को बिखरने से बचाते हैं और मुख्य कहानी को जबरदस्त ताकत के साथ आगे बढ़ाते हैं.
डायरेक्शन
स्क्रीनराइटर एक्शान खान ने अपनी राइटिंग से फिल्ममेकिंग का एक बिल्कुल नया डायमेंशन बनाया है. उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह न सिर्फ सीन को जोड़ते हैं बल्कि किरदारों के अंदरूनी टकराव और मन की हालत को भी इस तरह से पकड़ते हैं कि दर्शक अपने आप उस दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं. फिल्म की पेस और डायलॉग के बीच बैलेंस इतना परफेक्ट है कि यह हर फ्रेम में जान डाल देता है. आज के सिनेमा में कहानी को बिल्कुल नए और गंभीर नजरिए से कहने का यह हुनर उन्हें आज के सबसे टैलेंटेड और दूर की सोचने वाले कहानीकारों में से एक बनाता है.
सिनेमैटोग्राफी
टेक्निकल नजरिए से यह फिल्म एक बड़े कैनवस और एक बहुत ही पर्सनल, घरेलू कहानी के बीच एकदम सही बैलेंस बनाती है. प्रोड्यूसर साक्षी यादव ने फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू को ऊंचे लेवल पर बनाए रखा है, झांसी , मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों और मुंबई की भागदौड़ को सच में बहुत ही दिलचस्प और दिल को छू लेने वाले तरीके से जिंदा किया है. अविनाश पंडिरकर और धर्मेंद्र चौहान की सिनेमैटोग्राफी इन रीजनल लोकेशन्स को एक खास गर्मजोशी, खूबसूरती और सादगी के साथ दिखाती है. उमेश राणे की बारीक एडिटिंग ने इस कई दशकों की कहानी के अलग-अलग दौर को बिना किसी रुकावट के स्क्रीन पर आसानी से मिलाने का मुश्किल काम पूरा किया है.
म्यूजिक
इस इमोशनल ताने-बाने की असली रीढ़ फिल्म का दिल को छू लेने वाला म्यूजिक है. श्री सिंधु, अग्निवरण, बिस्वजीत घोष और फराज अहमद जैसे कंपोजर्स ने एक शानदार और जादुई साउंडट्रैक बनाया है जो कहानी के हर ट्विस्ट और टर्न को जिंदा कर देता है. बाकी बची हुई कमियों को सिंगर शाहिद माल्या और अभिषेक शास्त्री की आवाजों से भरा गया है. उनके गाने और बैकग्राउंड स्कोर स्क्रीन पर सीन का असर दोगुना कर देते हैं और दर्शकों को रुला देते हैं.
कमियां
हालांकि यह फिल्म इमोशंस का समंदर है, लेकिन इसमें एक छोटी सी कमी है जो सबसे अलग दिखती है. कुछ सीन में ड्रामा और परिवार का झगड़ा और छोटा या छोटा किया जा सकता था. बीच के कुछ सीन बहुत ज्यादा लंबे लगते हैं और अगर उन्हें थोड़ा और टाइट किया जाता, तो मेन कहानी की रफ्तार बेहतर हो सकती थी. हालांकि, यह छोटी सी दिक्कत कहानी के फ्लो और इसके खूबसूरत सोशल मैसेज में कोई खास रुकावट नहीं डालती है.
आखिरी फैसला
शॉर्ट में कहें तो ‘समर्पित: फादर्स लव’ हाल के सालों में पेरेंटिंग और फैमिली रिलेशनशिप पर बनी अच्छी फिल्मों में से एक है, जो न सिर्फ एंटरटेन करती है बल्कि समाज को एक पावरफुल और जरूरी मैसेज भी देती है. अगर आप आज के एक्शन से भरपूर सिनेमा से थक गए हैं और कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जो आपके दिल को छू जाए, तो अपने पूरे परिवार, खासकर अपने माता-पिता के साथ थिएटर जाकर इस शानदार सिनेमाई ट्रीट का अनुभव करना आपके पैसे वसूल होगा. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.
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